इन बेटियों ने संघर्ष से हासिल किया मुकाम , आज है प्रेरणास्रोत

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जयपुर। कड़ी मेहनत व संघर्ष की बदौलत जिन्होंने अपने क्षेत्र में मुकाम हासिल किया और आज  महिलाओं की प्रेरणास्रोत बन गई है। दृष्टिबाधित होते हुए भी लगन से प्रशासनिक अधिकारी बनकर दिखाया तो बाल विवाह की जंजीर को तोड़कर अब महिलाओं के अधिकारों, बाल विवाह जैसी बुराई को मिटाने के लिए जुटी हुई है। वहीं एक महिला राज्य की पहली महिला कुली बनकर परिवार को पाल रही है।

दृष्टिबाधित सुनीता बनी मिसाल

sunita yadav rasजन्म से दृष्टिबाधित सुनीता कड़ी मेहनत करके आरएएस अधिकारी बनी। वर्तमान में राज्य बीमा एवं प्रावधायी निधि विभाग जयपुर में सहायक निदेशक के पद पर कार्यरत सुनीता ने बताया कि 2010 में उनकी पहली पोस्टिंग महिला एवं बाल विकास सेवा में बतौर कार्यक्रम अधिकारी हुई थी। महिला होने के साथ दृष्टिबाधित होने के कारण कई चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। बकौल सुनीता उनके मन में महिलाओं के लिए कुछ करने की इच्छा शुरू से ही थी। महिला एवं बाल विकास विभाग में अधिकारी रहते उन्होंने 21 महिला स्वयं सहायता समूहों को आर्थिक आजादी दिलाई। अब महिलाएं हाथ के बने सामान बाजार तक खुद बेचने जाती हैं। आरएएस बनने से पहले शिक्षक रही सुनीता ने 14 वर्ष तक अलवर के दौलतपुर के सरकारी स्कूल में पढ़ाने का काम किया। इस दौरान उन्होंने बालिका शिक्षा के साथ-साथ बाल विवाह जैसी बुराई को दूर करने के लिए भी कार्य किया। उनकी मेहनत की बदौलत ही दौलतपुरा गांव के लोग बालिका शिक्षा के साथ बाल विवाह जैसी प्रथा को भी मिटाने में जुट गए।

खुद के बाल विवाह का जताया विरोधroshani bhairvah

जब दो साल की उम्र में पिता का साया सिर से उठ गया तो मां भी उसे छोड़कर अपने मायके चली गई। दादा-दादी ने उसे पाला। हम बात कर रहे हैं टोंक के पीपलू तहसील की रोशनी बैरवा की। रोशनी बताती हैं कि जब वह आठवीं में पढ़ती थी, उसकी शादी की जा रही थी। लेकिन उसने विरोध करके विवाह नहीं होने दिया। रोशनी ने बाल विवाह का दर्द महसूस करके इसे मिटाने में जुट गई। उसने गांव की 22 लड़कियों का समूह तैयार करके बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ व बाल विवाह रोकने का जागरुकता अभियान शुरू किया और गांव में 25 बाल विवाह रुकवाए।

..लेकिन बेटी का नहीं करुंगी बाल विवाह

manju yadavपति के निधन होने के बाद परिवार के पालन पोषण का जिम्मा मेरे कंधों पर आ गया तो रेलवे स्टेशन पर यात्रियों का सामान ढोना पड़ा। पहले कभी इतनी मेहनत का काम नहीं किया था। मजदूरी के बाद  कंधे दुखते थे। लेकिन बच्चों की खातिर करना पड़ा.. दर्द सहना आदत बन गई। यह कहानी है जयपुर जंक्शन पर काम करने वाली इकलौती महिला कुली मंजू यादव की। फुलेरा के सुंदरपुरा निवासी मंजू ने बताया कि उसका विवाह 10 वर्ष की उम्र में कर दिया गया था। छोटी उम्र में बच्चे हो गए। पति ने भी साथ छोड़ दिया तो परिवार पालने का जिम्मा आ गया। ऐसे में पति के काम को संभाला और कुली का काम करने लगी। लेकिन बाल विवाह का वह दर्द अब मुझे महसूस होने लगा है। इसलिए दसवीं में पढऩे वाली बेटी का बाल विवाह में नहीं होने दूंगी। बच्चों को पढ़ा लिखाकर कुछ बनने की पूरी आजादी दूंगी। जिससे उन्हें मजबूरी में मजदूरी नहीं करनी पड़े।

mahilaye 111

 

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